रेउसा। गांजरी क्षेत्र में एक माह पूर्व आई भयंकर बाढ़ से पूरा क्षेत्र तबाह हो गया था। तमाम परिवार घर से बेघर हो गए जबकि सैकड़ों बीघा फसल बर्बाद हो गई। घाघरा व शारदा नदियों की कटान में घर व खेत गंवाने के बाद करीब एक सैकड़ा परिवार सड़कों व गलियारों के किनार गुजर बसर करने को मजबूर हैं। नदी ने सबकुछ पहले ही छीन लिया है, अब लोगों को सिर छिपाने तक की जगह नसीब नहीं हो पा रही है। सड़कों व गलियारों का किनारा ही कटान पीड़ितों की किस्मत बनता दिखाई दे रहा है।नदी के किनारे तटवर्ती इलाकों में ठंड बढ़ गई है। इन सर्द रातों में सड़कों के किनारे गुजर-बसर करना किसी जंग लड़ने से कम नहीं है। ग्राम पंचायत गौलोक कोड़र के सुकईपुरवा बंधे के पास रह रहे जगेश्वर, रामनिवास व माया प्रकाश ने बताया कि घर घाघरा नदी में समा गए हैं। करीब एक महीने से अधिक समय से हम लोग सुकईपुरवा बंधे पर पड़े हैं। रहने को अभी तक जमीन मुहैया नहीं हो पाई है। लोध पुरवा से जंगल टपरी मार्ग पर रह रहे सियाराम, मुकद्दम व किशोरी ने बताया कि सड़कों के किनारे खुले आसमान के नीचे गुजर बसर करने को मजबूर हैं। फसलें भी नदी में बह गई हैं, अब ऐसे में अपना और अपने बच्चों का पेट पालना मुश्किल हो रहा है। दूलामऊ से नरायनपुर मार्ग पर गुजर बसर कर रहे देशराज, नन्हे, कमलेश व हीरालाल ने बताया कि बाढ़ प्रभावित इलाके में नदियों के किनारे रात में भयंकर ठंड बढ़ जाती हो रही है। ऐसे में सड़कों के किनारे गुजर-बसर करना किसी जंग लड़ने से कम साबित नहीं हो रहा है। बाढ़ पीड़ितों ने बताया कि बाढ़ के समय में समाजसेवी संस्थाओं व शासन प्रशासन द्वारा जो राहत मिली वह नाकाफी साबित रही। कटान पीड़ितों ने बताया कि किसी तरह से मेहनत मजदूरी कर अपना व अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं। सड़कों गलियारों के किनारे जंगली जानवरों का भी खतरा बना रहता है। उजाले की भी कोई व्यवस्था नहीं है।
सीतापुर -जंग से कम नहीं कटान पीड़ितों की सर्द रातें

