उत्तर प्रदेशइलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) ने राजीव गांधी नेशनल एविएशन यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार के मामले में आदेश सुरक्षित रखा

by | Nov 24, 2021 | अपराध, ई पेपर, जनहित, नेशनल, बड़ी खबर, राजनीती, स्थापना और प्रेरणा | 0 comments

इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) ने राजीव गांधी नेशनल एविएशन यूनिवर्सिटी के रजिस्टार के मामले में आदेश सुरक्षित रखा। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने राजीव गांधी नेशनल एविएशन यूनिवर्सिटी (RGNAU), अमेठी के पहले रजिस्ट्रार जितेंद्र सिंह की बहाली से जुड़े मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिनांक 17 नवंबर, 2021 को फैसला सुरक्षित रख लिया जिसमें कि नागर विमानन मंत्रालय ने Special Appeal डबल बेंच में दाखिल की थी। माननीय न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और माननीय न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की Bench नागरिक विमानन मंत्रालय के माध्यम से भारत संघ द्वारा दायर एक Single Judge Bench के फैसले के खिलाफ एक Special Appeal पर सुनवाई कर रही थी। ज्ञात हो कि 17 सितंबर, 2021 को उच्च न्यायालय ने भारत सरकार एवं विश्वविद्यालय को श्री जितेंद्र सिंह (रैजिस्ट्रार) कि सेवाएँ बहाल करने का आदेश दिया था, परंतु High Court के आदेश के पालन करने के बजाय, भारत संघ की ओर से पेश हुए भारत के सहायक सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने पहला तर्क दिया कि जितेंद्र सिंह को बहाल करते समय Single Bench के न्यायाधीश ने अपने फैसले में गलतियाँ की और उन्होने अपने दलीलें पेश की। जितेंद्र सिंह (Registrar), जो व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए, उन्होने ने भारत संघ और विश्वविद्यालय की ओर से आए भारत सरकार के सहायक सॉलिसिटर जनरल (ASG) तथा अन्य वकीलों के तर्कों का कड़ा विरोध किया और संघ के सभी तर्कों का स्पष्ट रूप से सिलसिलेवार तरीके से High Court को स्पष्टीकरण दिया कि भारत सरकार की ओर से कोई भी नया तथ्य पेश नहीं किया गया है जिसका कानूनी विश्लेषण High Court के Single Bench ने नहीं किया हो। जितेंद्र सिंह ने पहला तर्क दिया कि भारत के राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के एक आगंतुक के रूप में नियुक्ति प्राधिकारी होने के कारण उनके समाप्ति आदेश को मंजूरी दे दी जो कि प्रकृति में कलंकपूर्ण था। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर हैं और उन आरोपों को स्वीकार करने से पहले भारत सरकार के नियमानुसार उन्हें किसी भी तरह की सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। इसके अलावा, इस संबंध में, न ही कोई विभागीय जांच कारवाई गयी। उन्होंने दूसरा तर्क दिया कि यदि उनकी सेवा परिवीक्षाधीन होने के कारण तथ्यों और सबूतों के आधार पर उन्हें सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना समाप्त कर दिया गया था, तो उनके बर्खास्तगी आदेश को दंडात्मक आदेश माना जाए और ऐसा दंडात्मक आदेश परिवीक्षाधीन के खिलाफ भी पारित नहीं किया जा सकता है। जबकि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप सुनवाई का अवसर दिया जाता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि संघ ने यह तर्क दिया था कि वह एक परिवीक्षाधीन थे, वह भी गलत था क्योंकि समाप्त होने से पहले उन्होंने नौ महीने की सेवा की थी, जो कि उनकी एक साल की परिवीक्षा का 75% होगा। विश्वविद्यालय के सेवा नियमों के अनुसार, यदि कुल परिवीक्षा अवधि का 75 प्रतिशत पूरा कर लिया गया है, तो इसे प्रभावी माना जाएगा और इसलिए, वह परिवीक्षाधीन नहीं था। साथ ही, जितेंद्र सिंह ने यह भी दलील दी कि उन्हें अपीलकर्ताओं (नागर विमानन मंत्रालय) द्वारा परेशान किया जा रहा है क्योंकि वह वर्तमान में बैंगलोर में रहते हैं, और बार-बार High Court लखनऊ आना उनके लिए सजा से कम नहीं है, खासकर जब वह जनवरी, 2020 से अबतक न्याय के लिए संघर्षरत है। दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए सभी तर्कों को ध्यान में रखते हाई कोर्ट की Double Bench की अदालत ने अपना आदेश सुरक्षित रखने का फैसला किया। इससे पहले, 17 सितंबर, 2021 को, माननीय न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान की उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने जितेंद्र सिंह की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया था और नागरिक विमानन मंत्रालय को निर्देश दिया था कि जितेंद्र सिंह को उनकी पहली नियुक्ति पर सभी परिणामी सेवा लाभों के साथ रजिस्ट्रार के पद पर बहाल किया जाए। जितेंद्र सिंह को 8 जनवरी, 2020 को नागरिक विमानन मंत्रालय ने असंवैधानिक एवं गैर- कानूनी रूप से उनके पद से बर्खास्त कर दिया था। बता दें कि जितेंद्र सिंह ने स्वयं अपने केस की पैरवी करते हुए जीत हासिल की है जिससे ये संदेश जाता है कि, सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं।