बलरामपुर -आजादी में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू बंसराज सिंह का योगदान अविस्मरणीय

by | Aug 18, 2021 | ई पेपर, जनहित, नेशनल, बड़ी खबर, राजनीती, स्थापना और प्रेरणा | 0 comments

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू वंशराज सिंह को सम्मानित करते अधिकारीदेश के आजादी में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू बंसराज सिंह का योगदान अविस्मरणीय छात्र जीवन से मृत्यु पर्यंत तक देश के लिए समर्पित रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देश की आजादी में कई बार खाई जेल की अपनाएंस्वतंत्रता दिवस पर विशेषबलरामपुर मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ पर जाएं वीर अनेक,,, यह ओजस्वी पंक्तियां जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे स्वर्गीय बाबू वंशराज सिंह पर सटीक बैठती हैं आजादी के मतवाले बाबू बंसराज सिंह मुख्यालय के गोदीपुर के मखनहां गांव के रहने वाले थे इनका जन्म 21 फरवरी वर्ष 1918 में हुआ था उस समय देश अंग्रेजों के गुलामी में जकड़ा हुआ था छात्र जीवन में ही देश को आजाद कराने के लिए स्वतंत्र आंदोलन में कूद पड़े थे बलरामपुर राज्य के उखड़ा आंदोलन में इन्हें 1 वर्ष नजरबंद की सजा मिली थी वर्ष 1942 में बलरामपुर राज्य के एल सी स्कूल जो वर्तमान में एमपीपी इंटर कॉलेज नाम है उसी विद्यालय के छात्र रहे हैं मिस्टर बेटस बलरामपुर रियासत में एक अंग्रेज मैनेजर हुआ करता था जिसने छात्रों का आंदोलन को चलने के लिए अपमानजनक शब्दों के साथ छात्रों का उत्पीड़न लगातार कर रहा था छात्रों का उत्पीड़न एवं देश की अस्मिता पर अपमानजनक टिप्पणी को छात्र बंसराज सिंह सह नहीं पाए और उन्होंने अंग्रेज मिस्टर बेटस को गुस्से में तमाचा मार दिया उसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि अब देश को आजाद कराने के लिए अपना जीवन समर्पित कर देंगे इस घटना ने कहीं ना कहीं उनके अंदर देश को आजादी की चिंगारी भी डाल दी वर्ष 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में छह माह की कैद एवं ₹100 का जुर्माना हुआ जुर्माना न अदा करने पर बंसराज सिंह को 6 माह अतिरिक्त सजा काटनी पड़ी देश के आजादी में विभिन्न आंदोलनों में सहयोगी बनके अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा लेते रहे उनके जीवन का मूल उद्देश्य है अंग्रेजों के गुलामी से देश को आजाद कराना था जिसके लिए उन्होंने घर परिवार छोड़कर जगह-जगह विभिन्न आंदोलनों में सहभागिता लेते रहे और अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल बजाते रहे इसके लिए उन्हें कई बार जेल की यातनाएं भी सही नहीं पड़ी लेकिन वह अपने उद्देश्य हटे नहीं निडर होकर लगातार अंग्रेजों के विरुद्ध जगह जगह पर आंदोलन में सहयोगी बनते रहे इनके जीवन पर चंद्र शेखर आजाद की अमिट छाप थी जो हुआ आजीवन उनके लिए समर्पित रहे देश आजादी के बाद उन्होंने अपने आदर्श महान क्रांतिकारी के नाम बच्चों को शिक्षा देने के लिए चंद्रशेखर आजाद शिशु निकेतन के नाम से विद्यालय संचालित किया देश से अंग्रेजों की गुलामी से तो बचा लिया था लेकिन पूंजीपतियों ने गरीबों एवं मजदूरों को अभी भी गुलाम बना रखा था जिसको लेकर वहां समय-समय पर गरीबों में मजदूरों के लिए आंदोलन करते रहे उनके हितों की रक्षा के लिए कई संघर्ष किए इसमें कई बार उन्हें गंभीर प्रताड़ना सहनी पड़ी एवं कई बार जेल भी जाने पड़े इनका उत्पीड़न के खिलाफ सदैव संघर्ष का अभियान जारी रहा देश के आपातकाल के दौरान 27 जून वर्ष 1975 ईस्वी से 11 मई 1975 ईस्वी तक इनको जेल में बंद कर दिया गया पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई के परम सहयोगी भी रहे जब लोकसभा का चुनाव स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई बलरामपुर जिले से लड़ने के लिए आए तो सहयोगी मित्रों के साथ बंसराज सिंह ने मदन मोहन शर्मा बाबू बैजनाथ सिंह दुलीचंद जैन लाल भगत सिंह के साथ मिलकर उन्हें चुनाव में विजई कराया बाबू वंशराज सिंह के बड़े भाई रघुनंदन सिंह जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिनके मार्गदर्शन पर स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष से यह प्रभावित रहे हैं इन्होंने अपने मित्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केशो राम शुक्ला के बलिदान के बाद उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में सदैव समर्पित रहे स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कई बार गोरखपुर गोंडा आदि जिलों में अंग्रेजों की यातनाएं सहने की बात कही जा रही है बंसराज सिंह का अधिकांश समय अंग्रेजों से देश के आजादी को लेकर आंदोलन से जुड़ा रहा है देश की आजादी के बाद बाबू वंशराज सिंह ने अपना निवास स्थान तुलसीपुर रोड के बलरामपुर देहात गांव में काली थान मैं बनाया जहां पर वह आजीवन किसान मजदूर गरीबों के हित के लिए संघर्षरत रहे इसके लिए उन्होंने कई बार किसान आंदोलन में अहम भूमिका अदा कर किसानों को पूंजी पतियों से निजात दिलाया परिजनों की मानें तो बंसराज सिंह के पूर्वज ग्राम मझौली विषय जनपद देवरिया के राजा थे जिनके परदादा महाबल सिंह ईसानगर घरोरहा खीरी लखीमपुर के राजा थे देश की आजादी के बाद बाबू बंसराज सिंह को बीसी जीएफ गोंडा का निर्विरोध चेयरमैन चुन गए थे काफी समय तक इस समिति के अध्यक्ष रहे जिले के शिक्षा एवं पिछड़ेपन को देखते हुए उन्होंने चंद्र शेखर आजाद शिशु निकेतन के नाम से स्कूल संचालित करके गरीब बेसहारा बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का भी अहम काम किया देश आजादी के बाद अखिल भारतीय सुंदरता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के तहत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों एवं उनके आश्रितों के साथ सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे बाबू बंसराज सिंह के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में विशेष योगदान को देखते हुए बलरामपुर विकास खंड कार्यालय कैंपस में स्थापित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सिलावट पर स्वर्ण अक्षरों से उनका नाम अंकित किया गया जो आज भी उनकी वीरगाथा को जीवंत कर रहा है बाबू वंशराज सिंह के 3 पुत्र स्वर्गीय शिवराज सिंह स्वर्गीय बादशाह सिंह एवं राजकुमार सिंह हैं मौजूदा समय में उनके सबसे छोटे पुत्र राजकुमार सिंह एवं पुत्री सविता सिंह पिता के पद चिन्हों पर चलने के लिए नियंत्र समाज सेवा से जुड़े हुए हैं बाबू बंसराज सिंह का विवाह सिसई गांव के जनवार खानदान में श्याम राजी पुत्री राम सिंह से हुआ था जो पत्नी धर्म का पालन करते हुए सदैव देश की आजादी में पति का भरपूर सहयोग देते हुए मृत्युलोक को सिधार गई बाबू बंसराज सिंह ने अपने पीछे बहू के साथ नाती वन नतिनी के रूप में दुर्गा सिंह आरती सिंह उमेश प्रताप सिंह विशाल सिंह प्रशांत सिंह शेषम सिंह रेशम सिंह संध्या सिंह उर्मिला सिंह सुभाष सिंह विभा सिंह को छोड़ गए हैं जो आज उनके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए निरंतर सामाजिक कार्य रहे हैं वर्तमान में उनकी नतिनी बलरामपुर देहात की ग्राम प्रधान भी रही हैं उनके छोटे बेटे राजकुमार सिंह आज भी शिक्षा स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक कार्य में निरंतर लोगों की मदद करके अपने पिता के आदर्शों पर चलकर कार्य कर रहे हैं देश के विकास एवं आजादी के लिए अपना जीवन निछावर करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू वंशराज सिंह का निधन 10 मई 2002 को काली थान में हो गया आपातकाल में